और वो चली गई - कुमार ऋत्विज की कहानी

विक्रांत , यानी विक्की की जिंदगी और मेरे जीवन की जद्दोजहद बहुत हद तक एक जैसी है । वो एक रंगकर्मी है और मैं भी । 

हम काफी क़रीब हैं । इसलिए अपने एहसास साझा करते रहे हैं । 

विक्रांत की जिंदगी से जडी एक घटना , जो उसने मुझसे साझा की थी , अक्सर याद आती है और तब मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।

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2013 के फरवरी महीने की बात है । विक्रांत ने बड़ी हिम्मत से अपनी एक सह कलाकार से प्यार का इजहार किया था । 

विक्की ने बताया था , ' मुझे लगा कि मेरी दोस्त को मुझसे प्यार है । लेकिन उसके जवाब ने मेरा दिल दहला दिया । 

उसने कहा , ' छोटे - मोटे शहरों में , दो - चार सौ लोगों के सामने हवा में हाथ लहराते हुए डायलॉग बोलकर जिंदगी की बुलंदी नहीं छुई जा सकती । तालियों की गड़गड़ाहट से समृद्धि नहीं आती ।

 ' विक्की का दिल टूट गया था । विक्रांत की पीड़ा मैं अच्छी तरह समझ पा रहा था । 

कुछ अरसे बाद जब हम मिले तो उसकी आंखों में दर्द का पनीलापन और खुशी की मुस्कान , दोनों की झलक थी । 

विक्की ने कहा , ' जानते हो ! वो कुछ दिन बाद ही एक सरकारी अधिकारी से शादी कर शहर से चली गई थी । उसी साल बिहार की सबसे पुरानी कला भवन नाट्य अकादमी को विशेष प्रस्तुति देने के लिए आमंत्रित किया गया था । 

प्रस्तुति के दौरान कई बार ऐसा हुआ कि ज़ोरदार तरीके से तालियां गंजी , फिर धीमी हुई , लेकिन कोई था , जो अब भी ताली बजा रहा था । 

मैंने देखा - एक युवती खड़ी होकर तालियां बजा रही थी । उसकी खुशी का ठिकाना न था । ये वही थी । प्रस्तुति के बाद वो मेकअप रूम में आई । 

उसकी आंखों से आंसू छलक आए थे । उसने कहा , ' विक्की , तमने आज साबित कर दिया कि धन - दौलत से क्षणिक सुख मिलता है लेकिन उम्दा अदाकारी दिल में बसा देती है । 

तुम रंगमंच को कभी न छोडना , मैं कुछ कहूं , इससे पहले वो एक बार फिर बगैर कुछ सुने चली गई । 

जाहिर है , विक्रांत के दिल में असीमित ऊर्जा का संचार हआ है । मंच का उसे जुनून था , जो अब और बढ़ गया है और उसका सकर्मी दोस्त होने के नाते मैं भी आत्मविश्वास से भर गया हूं ।

                               - कुमार ऋत्विज , पूर्णिया

Moral of the story : कहानी की सिख इसी में निहित है। " धन-दौलत से छनिक सुख मिलता है। लेकिन उम्दा अदाकारी दिल मे बसा लेती है।"

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